hello my dear friends. mai javed ahmed khan [ javed gorakhpuri ] novelist, song / gazal / scriptwriter. mare is blog me aapka dil se swaagat hai.
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गुरुवार, 14 मई 2020
शिक्षा
गवर्नमेंट भी कहतती है कि प्राईमरी स्कूल में अपने बच्चों को पढाएं मगर जिसने पढा और जो लोग विद्यालय को छोड़ कर देश परदेश भागे उन्हें वापस अपने गांव भाग कर आना पड़ रहा है ऐसे मे उन्हें अपने गांव और घर में घुसने के पहले उसी प्राईमरी स्कूल में चौदह दिन तक रोका जा रहा है जिससे ये एहसास होता है कि अगर शिछा लिए होते भागे न होते बाबा भीम राव की ही बात माने होते तो शायद आज ये दिन न देखने पड़ते आज एक अलग तरह की क्रांति होती । जिसे रोक पाना शासन प्रशासन के बस की बात नहीं थी ।
नागरिक
चार्टड प्लेन है , बुलेट ट्रेन है , भाभा अनुसंधान केन्द्र है ,
परमाणु बम है सशक्त फोर्स है , बेमिसाल कानून है ।
बहुमंजिली इमारते हैं , सवर्ग की अनुभूति कराने वाले
फाईव स्टार होटल्स हैं ।पश्चिम की सभ्यता हाबी है कोई
कमी नहीं है । आधुनिक दौर का न्यू इन्डिया है । तो फिर
दो हजार, ढाई हजार किलोमीटर महिलाएं अपने गोद में
तो कभी कंधों पर अबोध बच्चों को लादे हुए पैदल चल रही हैं आखिर क्यों ?
सारी सुविधाएं किसके लिए बनाई गयीं हैं ?
इनको तैयार करने में किन वर्गों के लोगों ने अपने खूंन
पसीने बहाए हैं ? आखिर हो क्या रहा है ।
आज अपने ही देश में देश के ही नागरिक पैदल चलें
भूख से मरें और बेरोजगार रहें ये क्या है ?
अगर जिंदगी बची तो क्या ये लोग इस दौर को कभी भूल पाएंगे। आज अगर कुछ ट्रेनें और प्लेनें चालू की गई हैं तो
वो धन उगाही के लिए या देश के नागरिकों के सहयोग के लिए । हला की जब पहला लाकडाउन लगा उसके बाद अगर इसे बढाना ही था तो यातायात को उसी समय से चालु रक्खा गया होता तो आज लोग अपने मासूम बच्चों के साथ पैदल यात्रा कर के मरते नहीं ।
जब न्यू इंडिया के पास कोरनटीन के लिये जगह नहीं थी
कोरनटीन में खिलाने के लिए रोटी की व्यवस्था नहीं थी ।
तो इन को रोकने की जरुरत ही क्या थी ।
रविवार, 10 मई 2020
आश्चर्य
लगभग पांच साल से मैं अपने बेडरुम में ही सोता हूं।
गोरखपुर जिले के ग्रामीण छेत्र से हूं गांव में ज्यादा तर
लोग बाहर खुले आसमान के नीचे ही सोते हैं ।
पांच साल पहले मेरी भी यही दशा थी । घर के अंदर
सोना बिलकुल अच्छा नहीं लगता था , खुले वातावरण
में प्रक्रित की ताज़ी हवावों और मेरे गार्डन में लगी बेईल
रातरानी , रजनीगंधा और तमाम फूलों की खुशबू के लिए
अक्सर मैं छत पर चला जाया करता था जहाँ बारह एक
बजे तक गानों का आनंद लिया करता था ।
कभी कभी नीद आ जाने से गाने रात भर चलते रहते थे
नींद खुलने पर बंद करता था । गीत सुनना आज भी मुझे
पसंद है आज भी रात में दो तीन घंटे सुनता ही हूं।
प्रक्रित प्रेमी भी हूं ये शौक बचपन से है मुझे ।
अप्रैल , मई और जून के महीने में यहां भयंकर गर्मी पड़ती है जबसे होश संभाल है भयंकर गर्मी ही देखा ।
कल मैं अपने फार्म हाउस पर गया था वहां मेरा एक आदमी परमानेन्ट रहता है मैने अपना बिस्तर रुम से बाहर बरामदे में लगवाया रात को बारह बजने के बाद मुझे ठंड लगने लगी इतनी की मोटा कंबल ओढना पड़ा ।
सुबह में जब उठ कर देखा तो ओस की बूंदे भी पडी हुई थीं इस मई के महीने में अक्टूबर के लास्ट और नवम्बर के पहले हफ्ते जैसी ठण्ड मुझे आश्चर्य में डाल दिया।
जब की ऐसा मैंने कभी नहीं देखा ।
मंगलवार, 5 मई 2020
वेंटीलेटर
बिना बिमारी के सबसे पहले कश्मीर आई,सी,यू में गया
अब आर,बी,आई भी पहुँच गया ।
संपूर्ण भारत और भारत की जनता वेंटीलेटर पर है अब
धीरे धीरे दोनों आई,सी,यू की ओर बढ रहें हैं ।
सोमवार, 4 मई 2020
किस्मत
इस दुनियां के हर इंसान की किस्मत अलग अलग है ।
इसे कोई लाख कोशिसों के बाद भी नहीं बदल सकता।
इसे जब अल्लाह (ईश्वर ) चाहता है तभी बदलता है वो
चाहे तो मिन्टों में जमीन से उठा कर आसमान की बुलंदियों पर पहुंचा सकता है और वो चाहे तो आसमान की बुलंदियों से गिरा कर जमीन की धूल में मिला सकता है । वो किसी के सामने रुबरु यानी शाछात नहीं आता वो माध्यम चुन लेता है उसी के द्वारा अपना काम कर लेता है।
रविवार, 3 मई 2020
खूंन
अब तुम्हें अपना इतिहास अपने खूंन से लिखना पड़ेगा
वरना जिस्म के एक एक बूंद खूंन पानी कीतरह बहा
देंगे यहां के लोग ।
शनिवार, 2 मई 2020
जीवन
जीवन है तो सुख दुःख दोनो है ।
कुछ विशेष प्रकार के जीवन होते हैं जिस में सुख ही सुख है दुख का साया तक नहीं होता । न कभी दुख की कलपना न कभी दुख का एहसास।
कुछ जीवन ऐसे होते हैं जिस में दुख ही दुख भरे होते हैं ।
इस में सुख का साया तक नहीं होता दुख से शुरू और दुख में ही खतम।
कुछ जीवन ऐसे भी होते हैं जिस में सुख भी हैं और दुःख भी है दुख से निकलने के लिए सुख को पाने के लिए दिन रात लड़ते हैं । इसी में सुख दुःख का एहसास भी होता है
कुछ सुख को हासिल करते हैं कुछ हासिल करने में जिंदगी के आखरी पड़ाव पर आ जाते हैं और मर जाते हैं ।
जिसका सुख पीछे बचे हुए लोग पाते हैं ।
चाहे सुख हो या दुख जिंदगी का होना जरुरी है ।
आगर जिंदगी है तो किसी न किसी का मजा तो मिलना ही है चाहे दुख का हो या सुख का, या फिर सुख प्राप्त करने की कल्पना का, अगर जीवन ही नहीं है तो कुछ भी नहीं ।
शुक्रवार, 1 मई 2020
आईना
आईने में कुछ नहीं होता वो बिल्कुल सादा है।
उसके सामने जो जैसा आता है वैसा ही दिखता है।
बुधवार, 29 अप्रैल 2020
फालो
मेरे ब्लॉग पर आने वाले सभी मित्रों , भाइयों और बहनों
से विनम्र निवेदन है कि मेरे पोस्ट के ठीक दाहिने तरफ
एबाऊट मी है जिसमें मेरी पूरी प्रोफ़ाइल है ।
ठीक इसी के ऊपर एक निले कलर का फालो का आप्सन है जिसे टच कर के फालो कर ले।
जिससे आप अपने विचार मुझे दे सकते हैं ताकि आप के
सुझाव के मुताबिक मैं अपने ब्लॉग को और भी बेहतर कर सकूं ।
आप का अपना
जावेद गोरखपुरी
पैसा
ठीक है , समझ रहा हूँ कि इस वक्त जो प्रतिबंध लाकडाऊन के रूप में आप के ऊपर लगा हुआ है उससे आप लोगों को काफी कस्ट हो रहा है ।
जबकि आज आप के मुहल्ले में और गांवों की गलियों में हर दिन सुबह शाम हरी सब्जियां और फल बेचने वाले आ जाते हैं दूध वाला भी आता है , दिक्कत आप को सिर्फ इस बात की है कि आप पहले की तरह आजाद नहीं हैं, आप को सिर्फ आजादी चाहिए अगर कोरोना जैसी महामारी न होती तो आप एक दिन का जो जनता कर्फ्यू लगा था उसके बाद कोई माई का लाल नहीं रोक पाता । इस महामारी के कारण आज आप मजबूर हैं , कुछ डर भी है और बहुत सारे उल्टे सीधे सवालात्मक विचार भी जिसके वजह से आप रुके हुए हैं लेकिन मैं आप से एक बात जानना चाहता हूँ कि जब कश्मीर में लाकडाऊन लगा तब
कौनसी बीमारी या महामारी थी ?
उस वक़्त पूरा भारत किसी खेल के स्टेडियम में खेल के हार जीत का निर्णय करते हुए आनंद ले रहा था ।
हमारे देश के गृहमंत्री जी ने कहा था कि कश्मीर आईसीयू में है इलाज चल रहा है जल्दी ही ठीक हो जाएगा ।
किस बात का इलाज किया जा रहा था ?
पूरी दुनियां से किसी को भी कश्मीर में नहीं जाने दिया जा रहा है क्यूँ भाई ?
भारत की सारी राजनीति पार्टीयां कमजोर पड़ गयीं थीं ।
उस वक़्त क्या हो रहा था यह पूरा भारत जानना चाहता था और आज भी जानना चाहता है ।
मुझे तो लगता है कि कश्मीर के मूल निवासी अब वहां बचे ही नहीं ।
वहां भूख से कोई मरने न पाये इसकी कोई व्यवस्था नहीं थी उस वक़्त प्रधान मंत्री केयर फंड भी नहीं था ।
उस वक़्त भारत का कोई भी व्यक्ति सहयोग देने के लिए
सामने नहीं आया।
उस वक़्त जो लाकडाऊन चल रहा था
कश्मीर में हर एक घर पर चार फोर्स लगाई गयी थी
उस वक़्त सुबह शाम फल शब्जी और दूध वाले नहीं जाते थे उस वक़्त दवा की दुकानें नहीं खुली थीं, उस वक़्त उनकी खेतियां नहीं काटने दी जा रहीं थी ।
उस वक़्त धर्ती के स्वर्ग को नर्क में बदला जा रहा था ।
और आज, आज आप को क्या परेशानी है ?
आज तो पूरा भारत आप के सुख दुःख के लिए आप के
साथ खड़ा है जश्न भी अपने घरों में लोग मना रहे हैं ।
पार्टीयां भी आयोजित हो रही हैं ।
क्या नहीं हो रहा है पैसा है तो जो चाहो सब कर सकते हो क्यों कि ये कश्मीर नहीं है मेरे भाई ।
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